23 Sept 2021

पारमार्थिक और लौकिक सफलता के कुछ सरल उपाय

 


-पुस्तक              पारमार्थिक  लौकिक सफलता के कुछ सरल उपाय

-लेखक              श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार

-प्रकाशक           गीतावाटिका गोरखपुर

-पृष्ठसंख्या            100

-मूल्य                    25/-

 

 

युगऋषि युग निर्माण की ईश्वरीय योजना को मूर्तरूप देने के लिए अवतरित हुए, यह सत्य है; तो यह भी सच है कि उनके साथ आत्मीय जुड़ाव अनुभव करने वाले व्यक्ति भी उसी योजना के अन्तर्गत विशेष रूप से आये या लाये गये। युग ऋषि ने अपनी असाधारण भूमिका निभाई तो परिजनों ने भी बहुत कुछ अनोखा-सराहनीय कार्य कर दिखाया। हमारे नैष्ठिक प्रयासों से युग ऋषि को जहाँ प्रसन्नता हुई वहीं व्यक्तित्व के विकास के सूत्रों के प्रति हमारी उपेक्षा ने उन्हें वेदना भी पहुँचाई। अपनी भूमिकाएँ निभाने की उनकी रीति-नीति तथा हम परिजनों की रीति-नीति में एक मौलिक भेद रह गया। उन्होंने हर भूमिका के बाद अगली भूमिका के लिए अपने व्यक्तित्व को और अधिक प्रखर और परिष्कृत बनाया, जब कि हममें से अधिकांश पिछली भूमिका की सफलता पर इतराते-इठलाते रहे। कार्य के बढ़ते स्तर, जिम्मेदारी की अगली कक्षा के अनुरूप स्वयं को परिष्कृत-प्रखर बनाने की जगह हम पूर्व सफलताओं का हवाला देकर ही आगे के मोर्चे फतह करने की कोशिश करते रहे। हमारी इसी भूल के कारण युग ऋषि को भी बार-बार वेदना झेलनी पड़ी और हमें भी मेहनत के अनुरूप लाभ नहीं मिल पाये।

ऐसी भूलें उनके शरीर रहते भी हुईं और उनके शरीर छोडक़र सूक्ष्म एवं कारण सत्ता में प्रवेश के बाद भी होती रही हैं। भूलें-तो भूल हैं। उनसे हानि तो होती ही है। सावधानी के अभाव में वे होती हैं, तो सावधानी बरतकर उन्हें ठीक भी किया जा सकता है। हर अभिभावक -प्रत्येक मार्गदर्शक यही चाहता है कि उनके बच्चों-अनुयायियों की भूलें जल्द ठीक हों। इसके लिए वे परिजनों से नादानी से होने वाली भूलों के कारण उभरी अपनी वेदना तथा भूलों के सुधार तथा परिजनों के विकास के सिद्ध सूत्रों को समय-समय पर व्यक्त करते रहे हैं। इस पुस्तक में उनके द्वारा व्यक्त ऐसे ही आलेखों के महत्त्वपूर्ण अंशों को संकलित सम्पादित किया गया है।

कहते हैं कि घटनाओं के स्वरूप भले ही बदलते रहें, लेकिन इतिहास स्वयं को दुहराता रहता है। समय काफी आगे बढ़ गया, मिशन काफी विकसित हो गया; किन्तु साधकों से होने वाली भूलों के पीछे एक ही तथ्य झलकता रहता है, वह है समर्थ मार्गदर्शक द्वारा निर्देशित सूत्रों के प्रति बरती गई असावधानी। मनुष्य अपने पूर्व पुरुषों के अनुभवों से सीख-सीख कर ही उन्नति के पथ पर बढ़ता रहता है। इसलिए युग साधकों, प्रज्ञापरिजनों को पूर्व समय की घटनाओं से सीख कर अपने प्रयासों को अधिक कारगर बनाने के प्रयास करने चाहिए। इस पुस्तिका का अध्ययन करने वालों को यह दृष्टि अवश्य मिल सकती है कि जिन कारणों से युग ऋषि को वेदना हुई उनसे बचते रहें, तथा जिन प्रसंगों से उनकी उमंगे बढ़ती हैं उन्हें जीवन में पर्याप्त स्थान दें। इसी के साथ सृजन मार्ग में आने वाली बाधाओं से बचते हुए, समर्थ सत्ता के संरक्षण में उच्चतर लक्ष्यों तक बिना डगमगाये, तेजी से बढ़ते रहने का विश्वास और कौशल भी विकसित होता रह सकता है।

 

 

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